उजालों का ये जलसा देख डरकर बैठ जाएगा
तले दीपक अंधेरा आज छिपकर बैठ जाएगा
गरीबों की वो बस्ती में रहेगी तिरगी कायम
फकत फिर आज वो मुफलिस रोकर बैठ जाएगा
उरूज पर चढ़ के सूरज लाल पीला हो रहा बेहद
उफक पर शाम तक ये जर्द पैकर बैठ जाएगा
इधर सूरज के जाते ही फकत वो रात आएगी
बिछा काली सी चादर चांद उस पर बैठ जाएगा
शिकस्ता पर लिए वो आसमां में उड़ नही सकता
परिंदा थक गया तो छत पे आकर बैठ जाएगा
परिंदे का नही दैरो हरम से कोई वाबस्ता
शिकम खातिर दाना चार पाकर बैठ जाएगा
समय पर खाद पानी डालते रहना मुहब्बत के
अगर बुनयाद हो कमजोर तो घर बैठ जाएगा
अभी उफान पर होने सबब ये शोर ज्यादा है
जरा थमने दे दरया को ये पत्थर बैठ जाएगा
सियासत के लिए मुद्दा फकत दैरो हरम ठहरा
मिली कुर्सी सभी कुछ वो भुलाकर बैठ जाएगा
तपा है आग में लोहा बना है मुल्क के खातिर
जो देखे हौसला इनका सिकंदर बैठ जाएगा
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