2122 2122 2122 2122
मुल्क में हर आदमी के हाथ पत्थर तो नहीं है
बस जरा हालात बिगड़े हैं ये बदतर तो नहीं है
जूगनू लेकर जरा से हो रहे मतवाले सब ही
कौन समझाए उन्हे के हाथ अख्तर तो नही है
ढुंढते हैं लोग जिसको दरबदर होकर जहाँ में
झांक के देखे कभी तो खुद के भीतर तो नहीं है
आसमां नीचे बिछौना डाल सोते है मजे से
क्या बताएं दर्द उनके सर पे छप्पर तो नही है
क्या हुआ जो फिर नया इक हादसा सा हो गया है
ये सियासत के लिए मुद्दा से कमतर तो नही है
भागते क्यूँ लोग पीछे है सियासत दान के यूँ
आपका खादिम है ये कोई रहबर तो नही है
है फकत अखबार की स्याही लहू ये आदमी का
वक्ते फितरत की गवाही इससे बेहतर तो नही है
है लहूलुहान सिस्टम आदमियत रो रही है
रोज ही इक हादसा तामीर जर्जर तो नहीं है
मौत भी घायल हुआ है आज मंजर देख कर ये
सोचते हैं हादसा ये कोई महशर तो नहीं है
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