Monday, 18 February 2019

ये आग बुझने न पाए खयाल रक्खा है

ये आग  बुझने  न पाए   खयाल  रक्खा है
इताब   सीने में   हमने   संभाल  रक्खा है

बुझा न  पाएगा   ये वक्त  भी कभी इनको
जला के  क्रोध का  ऐसा  मशाल रक्खा है

लहू  का  रंग  न  काला  पड़े  शहीदों का
तबाही  खौप के  मंजर को पाल रक्खा है

किया है  घात  लगाकर  शिकार  शेरों का
जिहाद  ओढ़ वो  दुश्मन  कमाल रक्खा है

शरीक अपने भी कुछ लोग साजिशों पर हैं
जो सब गुनाह पे  परदा सा डाल रक्खा है

यकीन  करते नही  कुछ तो हादसों पर भी
सबूत  मांग के  बढ़िया  मिशाल  रक्खा है

हरेक   बूंद का   होगा   हिसाब  दुश्मन से
तमाम  मुल्क  यही  ख्वाब  पाल  रक्खा है

हुई है  चूक  बड़ी  अब कि  बार  दुश्मन से
गलत वो मौन का मतलब निकाल रक्खा है

तुफां के  आने के  पहले की  है ये खामोशी
तमाम   मुल्क   दिलों  में  बवाल  रक्खा है

करे  वो  मौज  लड़े फौज   ये  सियासत है
वो  मौन  मुद्दों  पे  क्यूँ  है  सवाल रक्खा है

सकी  न   आखिरी  दीदार  करने  बेटे का
वो  मां ने  आज  समंदर  संभाल  रक्खा है

जनाब  हादसा  ये  यूं  ही  तो  नही  बरपा
घरों  में  हमने  ही   गद्दार  पाल  रक्खा है

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