Wednesday, 6 February 2019

रही है उम्र भर ये जिंदगी अखबार क्या कहिए

1222 1222 1222 1222
रही है उम्र भर ये जिंदगी अखबार क्या कहिए
तकाजे रोज हैं दहलीज़े इश्तेहार क्या कहिए

जरूरत की रही रेहन हमारी सांस भी अक्सर
बिकी है ख्वाहिशें सब की यहां हर बार क्या कहिए

जिधर देखो है रौनक सी बड़ी माहौल जगमग है
मगर कायम है अब भी शहर में अंधकार क्या कहिए

न देखो राह सूरज की सहर हो जाएगी वरना
उजाले जूगनुओं से ही करो अब यार क्या कहिए

जलाकर पुतलों को खुश होता है जमाना अब
अजब है ये रवायत और गुनहगार क्या कहिए

महज अब रस्म निभाने लगे हैं लोग हंसने का
नही अब आते हैं वो पहले से त्यौहार क्या कहिए

कवायद है गजब सब की बुराई अंत हो जाए
शहर में बिकते रावण गजब बाजार क्या कहिए

पड़ा है जर्द सा वो चाँद जब से है तुम्हें देखा
बड़ा ही सुर्ख था सुन तजकिरा ए यार क्या कहिए

वहां तो गंध भी बारुद की आती फिजाओं में
रहा कल तक जो खुश्बू से बड़ा गुलजार क्या कहिए

अदावत के बहाने खूब है अब पास सबके ही
नही दिखता किसी की आंख में अब प्यार क्या कहिए

यहां बस जोर है मजहब पे सबका ही जिधर देखो
बढ़ी है मुल्क में ये ही वजह तकरार क्या कहिए

छिपाए फिरते हैं पहलू में ही खंजर यहां सब ही
करोगे क्या किसी पे अब यहां एतबार क्या कहिए

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