अपनी बेपरवाही से किस्मत की साजिश चल गई
वक्त बदला जो जरा अपना तो दुनिया बदल गई
जमाने में ढुंढते रहे हम अपनी इक पहचान जुदा
खुद के भीतर जब झांका फिर नियत संभल गई
खर्च होते रहे घर बार मे हम बेहद नाप तौल कर
बाजार से जो गुजरे अचानक तबीयत मचल गई
उलझे रहे हम ताहयात खुशियों को घर लाने में
खबर न हुई उम्र कब खिड़कियों से निकल गई
फिरते रहे हाथों में ले रिश्तो की जमी बर्फ को
नफरते जमी की जमी रही बस बर्फ पिघल गई
जहन में खयालातो के कुछ तेवर बागी हो गए
नसीब की धुप फिर से अच्छी ग़ज़ल निगल गई
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