Monday, 7 December 2015

मंदिर मे भगवान कैद है मुरत में इमान कैद है

मंदिर मे भगवान कैद है मुरत मे ईमान कैद है
अपनी बंधी सोच से शहर मे हर इंसान कैद है

जुदा जुदा सुरत मे है वो कितने ही किरदार मे
बरसो से अबला है नारी मर्दो मे हैवान कैद है

खनकते सिक्को की शोर मे खो गई बेचारगी
सत्ता के गलियारो मे भी अब बेईमान कैद है

बेहद खुश है आज वो दाने दाने का मोहताज
उसके हर निवाले मे भी इक मेहरबान कैद है

नजर आने लगी है बाप के चेहरे पे भी झुर्रीयां
उन पेशानी की लकीरो मे इक परेशान कैद है

तंगहाली के दौर मे भी निगाहे रखता चांद पर
मुफलिस के ख्वाब मे महल आलिशान कैद है

वो महज झंडा नही है तिरंगे की सुरत है जो
लहराते तीन रंगो मे वतन की पहचान कैद है

सुरत देख होने लगी है नज्मो की इस्लाहियत
कुछ बेहद खास ही तासीर मे कद्रदान कैद है

हरेक सफा सजाया है बेहद ही सलाहियत से
जेहन के सफीने मे बिसरी सी दास्तान कैद है

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