Monday, 28 December 2015

हमसे ही गुफ्तगू की उन्हें फुर्सत नहीं मिली

हमसे ही गुफ्तगू की उन्हें फुर्सत नहीं मिली
हर इक शय थी जद में ये दौलत नहीं मिली

हर दिल अजीजी का ही  गुमां उम्र भर रहा
उनकी नजर हमको वो  इज्जत नहीं मिली

मिलती रही तमाम उम्र ही   खैरात की तरह
हक में ही थी जो अपने वो नेमत नहीं मिली

अक्सर ही तलबगार रहे हम  इश्क के लिए
जिस्मो के इस बाजार में  चाहत नहीं मिली

कितने किये जतन कि अब तो चैन से जीये
पुरी जिंदगी यूं ही बीत गई इशरत नहीं मिली

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