हमसे ही गुफ्तगू की उन्हें फुर्सत नहीं मिली
हर इक शय थी जद में ये दौलत नहीं मिली
हर दिल अजीजी का ही गुमां उम्र भर रहा
उनकी नजर हमको वो इज्जत नहीं मिली
मिलती रही तमाम उम्र ही खैरात की तरह
हक में ही थी जो अपने वो नेमत नहीं मिली
अक्सर ही तलबगार रहे हम इश्क के लिए
जिस्मो के इस बाजार में चाहत नहीं मिली
कितने किये जतन कि अब तो चैन से जीये
पुरी जिंदगी यूं ही बीत गई इशरत नहीं मिली
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