Friday, 4 December 2015

अच्छी लगी

खेलते बच्चो के हाथो  मे गोंटी अच्छी लगी
तरक्की के इस दौर में भी धोती अच्छी लगी

भीड भरे शहर की मसरूफियत के बनिस्बत
सीधे सादे गांव की  हमे सादगी अच्छी लगी

दुसरो से छिनकर खुशियाँ हमे न देना मौला
अपने हक से जो मिले वो खुशी अच्छी लगी

बेफिजूल है क्या मजा है झुठ और फरेब मे
अम्न चैन से जो गुजरे वो जिंदगी अच्छी लगी

आंखे चुंधियाती शहरो की रोशनी के दरमियाँ
मुझको मिट्टी के दिये की रोशनी अच्छी लगी

बासी रोटी सेंक कर जो नास्ते मे मुझे मां ने दी
हर अमीरी से मुझे वो मुफलिसी अच्छी लगी

दिन चढे तक बिस्तरो से चिपकी  शहरीयत से
सुबह मे खिलते फुलो की ताजगी अच्छी लगी

सजी देखी इक दुकान मे दोनो पाक ए किताब
हमे गीता औ कुरान की ये दोस्ती अच्छी नही

बेचैन सा रहता है इन दिनो वो हमसे बेखबर
दुआ करे सलामत की ये बेरूखी अच्छी लगी

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