Friday, 20 November 2015

रुह से चल जिस्म तक हो रही बगावत देखिये

रूह से चल जिस्म तक हो रही बगावत देखिये
दिल से दिल के दरमियाँ कैसी अदावत देखिये

किस कदर मायूस हो हम उस शहर से लौटे है
तेरे दर पे तुझसे न मिलने की मलालत देखिये

अहसास तेरी रूसवाई का अश्को को भी रहा
सुख गई आंखे ही रिश्तों की नजाकत देखिये

आशनाई मे तेरी हम तुझसे ही मशहूर हुए है
तुमको ये भी खबर नही हद जलालत देखिये

रूबरू जब हो कभी वो तब न सुनाये दास्तां
रकीबो से खबर लेने की खुब अदायत देखिये

दैरो हरम क्या मालूम उसको ही जाना खुदा
आस्ताने सब भूल गये ऐसी अकीदत देखिये

मसफिल सजी है वहां घर मेरे घर मे खामोशी
न्यौता शरीकी भेज रहे उनकी शराफ़त देखिये

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