Monday, 30 November 2015

जीने का तरीका वो जानता है बहुत

जीने का तरीका वो जानता है बहुत
मुश्किलो से तो गहरा रिश्ता है बहुत

उम्र पुरी गुजारी है इसी जद्दोजहद मे
अपनो की भीड़ मे भी तन्हा है बहुत

मुफलिस की बस्ती मे जलता है दिया
आज भी वहां किश्त पे जिंदा है बहुत

रईसो की कोठी मे रिश्ते बेलिबास है
गरीब घर मे बेटियों पर परदा है बहुत

सजदे मे वो दर दर ही झुकता रहता है
दैरो हरम की तासीर मानता है बहुत

ताउम्र की मिल्कियत अल्फाज दे रहा
बच्चो के सामने आज शर्मिंदा है बहुत

लडा जो जिंदगी से वो अब हार गया
बेटी को बिदा करते हुए रो रहा बहुत

कभी खुशी कभी गम मे ही गुजर गई
ये जिंदगी बस बेवफा है बेवफा बहुत

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