ये अदद एक देश ही नही है ये माता हमारी है
असहिष्णुता नाराजगी क्या माता से तुम्हारी है
मां के चार बेटे है तो आपस मे तकरार होती है
कभी रूठ जाने पर क्या ममता पर वार होती है
देश ने तुम्हे इज्ज़त दौलत औ शोहरत अता किया
जरा खरोंच से तुमने अपना सारा हाल बता दिया
भारत माता के बहते आंसू तुमने बोलो कब पोंछे
अपनी हैसियत से किसी लाचारो की कब सोचे
दानिशमंद कलमनवीस फनकार और जाने कई
दुकानदारी जब चलती रही जुबाने खामोश रही
आपके कलम से फन से कौन सी क्रांति आ गई
कहां अब माहौल बिगड़ा कहां अशांति आ गई
देश मे अब भी भुखे है अब भी लाचार बसते है
दो तल्ले रहने वाले आज चार तल्लो पर बसते है
कभी लाचारी भ्रष्ट व्यवस्था अपनी दो बाते बोलो
असमानता अशिक्षा आतंकवाद पर मुह खोलो
असहिष्णुता का नारा ही ये राजनीति से प्रेरित है
देश हित की बात करो रिआया त्रस्त है उद्वेलित है
अलग मुकाम हासिल है तो दानिशमंदी परिचय दो
पक्षपात से दूर रहकर तुम निष्पक्ष भरा निर्णय दो
देश ने तुम्हे चाहा है अपने सर आंखो पर बिठाया
अपनी ओछी हरकत से तुमने सबका दिल दुखाया
इज्ज़त के बदले ही अक्सर इज्ज़त है मिला करती
प्यार मोहब्बत के आगे सारी ही बुराई डरा करती
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