हकीकत मे ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है
रवायतो का वो चलन अब चोचलो मे दिखता है
जाओ परिंदो अब अपना बसेरा कही और करो
मेरे शहर मे पानी तक अब बोतलो मे बिकता है
फैले हाथो पर चवन्नी देने तक औक़ात नही है
भूख खडा चौराहे पर शौक होटलो मे बिकता है
बाजारो मे आंसूओ के खरीदार कहां मिलते है
जज्बात भी तो मुशायरो महफिलो मे दिखता है
अभागी सी इक झोपडी बेचारी अंधेरे मे रहती
जगमगाता सारा मंजर बस बंगलो मे दिखता है
मेलजोल की वो बाते तो भूली बिसरी हो गई
सारा भाईचारा तो बस अब जंगलो मे दिखता है
कोठीयो मे हरदम ही पकवान छनाते रहते है
जाने कब से पसरा मातम चुल्हो मे दिखता है
रिश्ते नाते अपने घर पर भी आते जाते रहते है
बदले हुए लहजे अब उनके बोलो मे दिखता है
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