Tuesday, 24 November 2015

हकीकत में ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है

हकीकत मे ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है
रवायतो का वो चलन अब चोचलो मे दिखता है

जाओ परिंदो अब अपना बसेरा कही और करो
मेरे शहर मे पानी तक अब बोतलो मे बिकता है

फैले हाथो पर चवन्नी देने तक औक़ात नही है
भूख खडा चौराहे पर शौक होटलो मे बिकता है

बाजारो मे आंसूओ के खरीदार कहां मिलते है
जज्बात भी तो मुशायरो महफिलो मे दिखता है

अभागी सी इक झोपडी बेचारी अंधेरे मे रहती
जगमगाता सारा मंजर बस बंगलो मे दिखता है

मेलजोल की वो बाते तो भूली बिसरी हो गई
सारा भाईचारा तो बस अब जंगलो मे दिखता है

कोठीयो मे हरदम ही पकवान छनाते रहते है
जाने कब से पसरा मातम चुल्हो मे दिखता है

रिश्ते नाते अपने घर पर भी आते जाते रहते है
बदले हुए लहजे अब उनके बोलो मे दिखता है

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