हर शख्स यहां अपनी बदगुमानी मे रहता है
बेपरवाह हकीकत से जुदा रवानी मे रहता है
आजकल की नई फसल के शौक है बडे बडे
नही दिखता है बाप किस परेशानी मे रहता है
कोठियो तक सिमट गई चकाचौंध त्योहार की
अंधेरा सदा ही झोपडी के जिंदगानी मे रहता है
छुटभैये हमारे गांव के निजाम बनकर फिर रहे
हमने सुना था वो हुकुमते राजधानी मे रहता है
खुशियो की तलाश मे जो जद्दोजहद करता है
पसीना भी उसी शख्स की पेशानी मे रहता है
परेशान हो सकता है सच हारता नही कभी
झुठ जो है हरदम ही गलत बयानी मे रहता है
हर शख्स के किरदार मे रहता है असर खुन का
ओछी हरकते नही किसी खानदानी मे रहता है
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