चिल्लरो मे खनकते जज्बात को देखा
आज फिर दबे हुए से हालात को देखा
जगमगाते शहर के उजास के दरमियाँ
एक नन्हे से दिये की औक़ात को देखा
त्योहारो की सब चमक फीकी पड गई
कुडे बिनते हुए जब नवजात को देखा
त्यौरियां चढ जाती है जिनको सुनकर
ऐसे भी चुभते हुए सवालात को देखा
अदावत रखते थे जो जमाने के रूबरू
उनमे छिप छिप के मुलाकात को देखा
हया की दहलीज़ लांघ नहीं पाए कभी
दायरे मे बंद लफ्ज़े मोहताज को देखा
बहुत माहिरी हासिल है बरसने मे इन्हे
आंखो से बेमौसम के बरसात को देखा
किश्तों पे है मौत पर भी हौसले बुलंद
जिंदगी से वो जंग के लम्हात को देखा
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