अंधेरो की हस्ती को मिटाने के वास्ते
एक टुकड़ा धुप मेरे घर भी चाहता हूँ
मेरे बच्चे भी कभी आसमान देख ले
थोडे से उजाले मै इधर भी चाहता हूँ
वाकिफ हूँ बखुब ऐ खुशी तेरे कद से
करना तुझे हासिल पर भी चाहता हूँ
सजदे मे परवर हम जो रहते है हरसूं
इबादत का अपने असर भी चाहता हूँ
उम्र यूँ ही उलझने सुलझाने मे गुजरी
सुखन ख्यालो के सफर भी चाहता हूँ
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