Tuesday, 24 November 2015

अंधेरों की हस्ती को मिटाने एक टुकड़ा धुप

अंधेरो की हस्ती को मिटाने के वास्ते
एक टुकड़ा धुप मेरे घर भी चाहता हूँ

मेरे बच्चे भी कभी आसमान देख ले
थोडे से उजाले मै इधर भी चाहता हूँ

वाकिफ हूँ बखुब ऐ खुशी तेरे कद से
करना तुझे हासिल पर भी चाहता हूँ

सजदे मे परवर हम जो रहते है हरसूं
इबादत का अपने असर भी चाहता हूँ

उम्र यूँ ही उलझने सुलझाने मे गुजरी
सुखन ख्यालो के सफर भी चाहता हूँ

No comments:

Post a Comment