Tuesday, 3 November 2015

उलाहने ही कुछ सुनाने चले आते

उलाहने ही कुछ सुनाने चले आते
कभी तुम किसी बहाने चले आते

आंखे थक गई है टकटकी लगाए
ठहरे समंदर को बहाने चले आते

आ जाते है खयाल तेरे अल सुब्ह
शाम ए महफ़िल सजाने चले आते

तंज करता है जमाना तेरे नाम से
कुछ पल उन्हे दिखाने चले आते

सभी ने सताया है हमे बारी बारी
तुम भी जरा सा सताने चले आते

यूँ तो हमे रूठने की इजाजत नही
जो रूठे आज तो मनाने चले आते

मुहब्बत के दम कल भरते थे बहुत
जरा वो मुहब्बत दिखाने चले आते

जागते हुए गुजरी कितनी ही राते
सुकून भरी नींद सुलाने चले आते

उलाहने ही कुछ सुनाने चले आते
कभी तुम किसी बहाने चले आते

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