होंटो पे मुस्कान दिलो मे खाई है
अपनो ने भी खुब रस्म निभाई है
कोने मे पडी रो रही है बुढी आंखे
आज भी न आयी मां की दवाई है
आज वसीयत बनवायेंगे बाबूजी
इसी खातिर ही इकट्ठे सारे भाई है
छोड के सारे नाते बेटी चल देती है
जमाने की इन रवायतो की दुहाई है
हिस्सा मां का वो बाबूल की लाडली
अनजाने संग करनी उसकी विदाई है
पीहर औ ससुराल मे बेटी बंट जाती
कतरा कतरा सबके हिस्से मे आयी है
आज यकीनन ये तकिये गीले हो जाये
आंखो से जब्त कैदी को दे दी रिहाई है
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