Sunday, 29 November 2015

होठों पे मुस्कान दिलो मे खाई है

होंटो पे मुस्कान दिलो मे खाई है
अपनो ने भी खुब रस्म निभाई है

कोने मे पडी रो रही है बुढी आंखे
आज भी न आयी मां की दवाई है

आज वसीयत बनवायेंगे बाबूजी
इसी खातिर ही इकट्ठे सारे भाई है

छोड के सारे नाते बेटी चल देती है
जमाने की इन रवायतो की दुहाई है

हिस्सा मां का वो बाबूल की लाडली
अनजाने संग करनी उसकी विदाई है

पीहर औ ससुराल मे बेटी बंट जाती
कतरा कतरा सबके हिस्से मे आयी है

आज यकीनन ये तकिये गीले हो जाये
आंखो से जब्त कैदी को दे दी रिहाई है

No comments:

Post a Comment