हाले-दिल सबको सुनाने की जरूरत क्या है
दर ब दर रो के दिखाने की जरूरत क्या है
बस हंसी में ही उड़ाते है जमाने वाले
खुद को अखबार बनाने की जरूरत क्या है
कोई हमदर्द कहीं अब तो नही मिलता है
दर्द बाजार में लाने की जरूरत क्या है
अब अगर भूल गए वो ही सितम करना तो
खुद से इस दिल को दुखाने की जरूरत क्या है
झेलने पड़ते हैं खुद को ही मसाइब अपने
दरमियाँ रब्त को लाने की जरूरत क्या है
जल रहा आग में अपनी ही लगाई अब वो
अब हमें उसको जलाने की जरूरत क्या है
एक चेहरे पे कई रंग लगे हैं साहब
और चेहरे को लगाने की जरूरत क्या है
वो मेरे नाम पे कीचड़ है उछाला करता
अब उसे सर पे बिठाने की जरूरत क्या है
वो भी शामिल था तबाही पे तमाशा बनकर
उसके दर सर को झुकाने की जरूरत क्या है
है सरापा ये बदन रूह जहन तेरा ही
ऐ खुदा तुझको रिझाने की जरूरत क्या है
सोग के घर में तमाशों की है कोशिश जारी
फिर तसल्ली ही बंधाने की जरूरत क्या है
जिस बुलंदी पे मेरा मुल्क खड़ा है साहब
हादसों पर भी लजाने की जरूरत क्या है
No comments:
Post a Comment