धुंए से माँ का गहरा नाता था
बाबूजी को चुल्हे का खाना भाता था
अब तो मिट्टी से रिश्ता ही टुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया
धुल भरी गलियों मे दिन गुजरते थे
जिनसे लडते थे उन्ही पे मरते थे
अब तो अपनो से बतियाना छुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया
आंगन मे परिवार इकट्ठा होता था
हर दिन त्योहारो का आलम होता था
अब परिवार एक कमरे मे सिमट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया
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