Thursday, 30 July 2015

गांव हमारा कितना पीछे छुट गया


धुंए से माँ का गहरा नाता था
बाबूजी को चुल्हे का खाना भाता था

अब तो मिट्टी से रिश्ता ही टुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

धुल भरी गलियों मे दिन गुजरते थे
जिनसे लडते थे उन्ही पे मरते थे

अब तो अपनो से बतियाना छुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

आंगन मे परिवार इकट्ठा होता था
हर दिन त्योहारो का आलम होता था

अब परिवार एक कमरे मे सिमट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

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