212 212 212 212
ज़िन्दगानी तरसती नहीं चाहिए
मौत भी इतनी सस्ती नहीं चाहिए
ढूंढता ही रहा हूँ मैं इंसानियत
आदमियों की बस्ती नहीं चाहिए
देख ली मौजे दुनिया की सच्चाई सब
झूठ है सब ये मस्ती नही चाहिए
खुद को ही ढूंढने की जो नौबत पड़े
मेरे मालिक वो हस्ती नही चाहिए
आदमी आदमी को न पहचाने वो
मर्म की तंगदस्ती नही चाहिए
वाह, बहुत बढ़िया।
ReplyDeleteशानदार👌