Thursday, 1 October 2020

हर गुलसिताँ है राएगा गर तितलियाँ न हो

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हर  गुलसिताँ  है  राएगा  गर  तितलियाँ न हो
मतलब  नही  है  जिंदगी   जो  मस्तियाँ न हो

मिलते  हैं   यार   रोज   बहुत  यूँ तो  आदमी
क्या  फायदा  है  जीने  का गर हमनवाँ न हो

गर   मुश्किलात   झेले   नही  दर्द  जाने क्या  
बेकार   है   हयात   जो   मजबूरियां   न   हो

सच्चाई  की  डगर  है  बहुत   कांटो  से  भरी
संभव  है  सीधी  राह  में  ये  सख्तियाँ  न हो

इक  जंग  रोज  लड़  रही सबकी ही जिंदगी
मुमकिन  है  सबके तन पे मगर वर्दियाँ न हो

कुछ दाग  फिर से  चांद पे  आए नजर मियां
मुमकिन  नही  है  उसपे कहीं फब्तियाँ न हो

मरता  नही  है  कोई  भी  अब  शर्म  से यहां
मिलता न कोई  जिसमें ये खुदगर्जियाँ न हो

दुनिया  जहां  की  फिक्र  न परवाह यार की
दुश्मन  मिले  हजार   ही   पर  बे कराँ न हो

मसला  शुरू  हुआ ही था की खत्म हो गया
खबरें वो बन न सकती हैं गर  सुर्खियां न हो

महबूब   ऐसा   चाहिए    हो   सादगी   भरा 
नखरे  मिजाज  नाज  न  हो शोखियाँ न हो

हालात  इस कदर  हुए  बदतर हैं आजकल
हर  बागबां  है  सोचता  गुलशन जवाँ न हो

ठंडी  हवाएं  आसमाँ   कुछ  धूप  भी  मिले 
रौनक नही वो घर में जहाँ खिड़कियाँ न हो

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