Thursday, 7 April 2016

फकत हिंदू रह गये और मुसलमां रह गये

फकत हिंदू रह गये  और मुसलमां रह गये
इंसा की जुस्तजू थी वो जाने कहां रह गये

कल तक जिस बस्ती मिलते थे चेहरे हंसी
वहां जात और जमात  के   निशां रह गये

रिश्तों के दरमियां कुछ बेरूखी सी छाई है
बोल चाल बंद बस  खामोश जुबां रह गए

भीड जमा तो हुई चौराहे हादसा देख कर
चंद लम्हों में वहां महज कहकशां रह गए

खुदकुशी की अर्जी है मुर्दों के इस शहर में
रफ्ता रफ्ता बस यहाँ खाली मकां रह गए

झुठ फरेब आतंक दहशत मिलते हैं यहाँ
मौजूदगी हर शै की आदमी सिवा रह गये

उलझ गए इस कदर  दैरो हरम के फेर में
अम्नो जुबां  भुल गये बेरब्त बयां रह गये

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