फकत हिंदू रह गये और मुसलमां रह गये
इंसा की जुस्तजू थी वो जाने कहां रह गये
कल तक जिस बस्ती मिलते थे चेहरे हंसी
वहां जात और जमात के निशां रह गये
रिश्तों के दरमियां कुछ बेरूखी सी छाई है
बोल चाल बंद बस खामोश जुबां रह गए
भीड जमा तो हुई चौराहे हादसा देख कर
चंद लम्हों में वहां महज कहकशां रह गए
खुदकुशी की अर्जी है मुर्दों के इस शहर में
रफ्ता रफ्ता बस यहाँ खाली मकां रह गए
झुठ फरेब आतंक दहशत मिलते हैं यहाँ
मौजूदगी हर शै की आदमी सिवा रह गये
उलझ गए इस कदर दैरो हरम के फेर में
अम्नो जुबां भुल गये बेरब्त बयां रह गये
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