Tuesday, 5 April 2016

अपनी ही ख्वाहिशों से बेजार आदमी

अपनी ही ख्वाहिशों से बेजार आदमी
खुद के   घर में जैसे अखबार आदमी

जरुरत के हिसाब बंट जाता है पुरे घर
इक इक पन्ना होकर    लाचार आदमी

बिताता हर दिन रिश्तों को समेटते हुए
जमाने की नजर में   गुनहगार आदमी

अपनो के बीच भी गुमसुम सा रहता है
तन्हाइयों का लगता है शिकार आदमी

बिखर जाता है पल में जरा सी बात पे
अपनो के बीच बना रहे दिवार आदमी

जात है जमात है   औकात भी है यहाँ
बंटे है सभी आपस में बेशुमार आदमी

भागता फिरता है  झूठी खुशी के पीछे
भुला अपने सब   रीत संस्कार आदमी

तरक्की के इस  चकाचौंध के दरमियां
रह गया है बन करके इश्तेहार आदमी

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