1212 1122 1212 22
बस इस हिसाब से ही जिंदगी ये चलती रही
जरुरतों पे ही ख्वाहिश सदा फिसलती रही/1/
कि रफ्ता रफ्ता फकत कारवाँ भी चलता रहा
यूँ हौले हौले दबे पांव उम्र ढलती रही/2/
हकीम बैद कोई काम ही नही आए
था मर्ज और दवा और कुछ ही मिलती रही/3/
करे हैं शोर रसोई में भूखे बर्तन भी
फिर इक कहानी नई घर में आज पलती रही /4/
इमारतें मेरे हिस्से की धूप लील गईं
उजाले देख के बस जिंदगी मचलती रही /5/
पढ़ी नही है मगर तर्जुबा है माँ को बहुत
हुनर से अपने वो दुख हर्ष में बदलती रही/6/
वो गुजरे पल ने दिया बे हिसाब दर्द हमें
भुला के कल को जरा जिंदगी संभलती रही /7/
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