Wednesday, 12 April 2023

सुख से जीने की चिंता में सब्र गवाएं फिरते हैं

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सुख  से    जीने  की    चिंता  में,     सब्र  गवाएं   फिरते हैं। 
दुख अपना   खुद अपने से   अब,    लोग  छिपाए फिरते हैं।। /1/

क्या अच्छा है क्या अनुचित है,  खूब  सरल है ये कहना। 
मसला   होने तक   पहले  सब,    दोष  दबाए  फिरते हैं।। /2/

मोल  नही   जिनका   होता है,   वो  ही   होते हैं  अनमोल। 
और  उन्हें  हम  नादानी में ,      व्यर्थ    लुटाए  फिरते हैं।। /3/

ठोकर  पे   ठोकर   लगती  है,   हमको  तो    हर बार यहाँ।
क्यूँ   हर दिन   पत्थर   हमसे    पहचान  छिपाए फिरते हैं।। /4/

तारीखें   लौट  आती  हैं  पर,   दिन   वापस  नही  आते हैं। 
कुछ   लम्हों  खातिर    जीवन  भर,   बस  बौराए फिरते हैं।। /5/

हम  पे भरोसा मत करना तुम,     करते हैं खुद से धोखा। 
चेहरे  पर    अक्सर    झूठी,    मुस्कान   सजाए  फिरते।। हैं/6/

ना  कोई   चिंगारी  दिखती ,  कहाँ  धुआँ  सा  उठता है। 
अचरज है  फिर   कैसे  यहाँ  कुछ, आग  लगाए फिरते हैं।। /7/

रक्खा है   थोड़ा सा  बचा कर ,  तुझको  अपने  किस्से में। 
किस्से  के   उस  हिस्से  में ,    खुद को  भरमाए फिरते हैं।। /8/

जंग छिड़े जब  अपनों से तो,    हारना  पड़ता है  खुद को। 
पेचीदगी   ये  रिश्तों की,     दिल  को   समझाए  फिरते हैं।। /9/

किसको सुनाए अब दुखड़ा हम, कौन सुनेगा इस दिल की। 
हमको   समझने   वाले  ही,  हम को   समझाए  फिरते हैं।। /10/

वक़्त नही  अब  पास किसी के, बे मतलब की  बातों का। 
मतलब  से   मतलब  की  बातें,   बस   बतियाए  फिरते हैं।। /11/

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