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जंग छिड़ी छंदों दोहों पर, सैफाई के कमरे में।
फिर नंगी हुई देख सियासत, गोसाईं के कमरे में।। /1/
अपने-अपने राम हुए अब, अपनी अपनी रामायण।
बिलख रहा चिंतन मानस का, दानाई के कमरें में।। /2/
फोन के बस की पैड पर मत, देश बदलते रह जाना।
फेसबुक ट्वीटर नही मिलते, सच्चाई के कमरें में।। /3/
त्याग तपस्या बलिदान और, प्रेम सिखाता है मानस।
दृष्टि दोष है दोष देखना , चौपाई के कमरे में।। /4/
कत्ल हुई मानवता फिर से, मजहब ग्रस्त मुहल्लों में।
दाग बहुत गहरे पसरे हैं, दंगाई के कमरें में।। /5/
भूख की दरकार है रोटी, चाहे जिससे मिल जाए।
मंदिर मस्जिद लरज रहे हैं, चतुराई के कमरें में।। /6/
नोटों के नीचे दबा मिला, कराहता घायल बेबस।
कुछ कहने की चाह लिए सच, अच्छाई के कमरें में।। /7/
कोई महीन कोई हल्के, हर मुद्दे पीसे जाते।
वक़्त के गोद में बरसों तक, पैमाई के कमरें में।। /8/
देख रहे उस्ताद ज़मूरे, घायल मन की पीड़ा को।
अश्क बहाते मिलते तुलसी, रघुराई के कमरें में/9/
दानाई - बुद्धिमता
शकेबाई - धैर्य, धीरज, सब्र, सहिष्णुता,
पैमाई - मापने का कार्य, पैमाइश
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