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महोत्सवों से इतर कभी देखता नही है
नजर में हाकिम के तो समस्या जरा नही है /1/
बस आकड़ों के ही फेर में उलझी है सियासत
गुजरती कैसे है राहों में जानता नही है/2/
मैं कैसे फहराऊँ अपने घर में कहो तिरंगा
कुछ अपने घर का ही जब कि मुझको पता नही है/3/
चराग लाखों जलाए तुमने उजालों खातिर
मगर चरागों तले उजाला हुआ नही है/4/
हुनर भी कुछ चाहिए पिरोने का मोतियों को
बस आंसूओ का पलक पे होना बड़ा नही है/5/
गुजर रही है कभी खुशी में कभी ये गम में
है जिंदगी बेवफा सी पर बेवफा नही है/6
रफू किये जा रहा उदासी मैं जिंदगी की
कहाँ से फिर जाने रिस रहा थम रहा नही है/7/
लगे हैं अब झांकने दिवारों के पार रिश्ते
दरार गारा भी भरने से छिप रहा नही है/8/
मोबाइलों में सिमट के बस रह गया है जीवन
किसी को परवाह अब किसी की जरा नही है/9/
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