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पेट भरे हो तब ही तो ये मजहब सारे दिखते हैं
भूखे को कब मंदिर मस्जिद और नज़ारे दिखते हैं /1/
करती है ये भूख तमाशे जीवन में कितने हर दिन
करतब करते चौराहों में कुछ बेचारे दिखते हैं/2/
मुफलिसों की झोंपड़ियों में खिड़की कोई नही होती
पैबंदों में छिपते बस तकदीर के मारे दिखते हैं/3/
टखने छाती से चिपका कर सो जाते हैं बेचारे
मांस नही है अस्थि पंजर जिस्म के सारे दिखते हैं/4/
अश्क उबाले माँ ने रात भर खाली से पतीले पर
भूख के मारे बेसुध बच्चे हारे हारे दिखते हैं/5/
सरकारों ने जनता को बस वादों से बहलाया है
वोटों खातिर गली गली ये हाथ पसारे दिखते हैं/6/
बाप के कांधो पर चढ़ कर तो दुनिया अच्छी लगती है
सच्चाई से जब मिलते हैं दिन में तारे दिखते हैं/7/
दुल्हन सी सज धज कर बैठीं हैं जरूरतें घर में
आरज़ू हसरत और उम्मीदें चीर कुंवारे दिखते हैं/8/
चेहरे कई लगा रक्खे हैं सबने अपने चेहरे पर
जाहिर है जोकर के बाकी छिपते सारे दिखते हैं/9/
कौन मुकम्मल है इस जग में किसमें कोई दोष नही
सब में ही है कुछ ना कुछ पर खास हमारे दिखते हैं/10/
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