Wednesday, 12 April 2023

तुम समझते क्यूँ नही

2122 2122 2122 212 
मैं  गुजस्ता  इक   दहर हूँ   तुम   समझते क्यूँ नही
मैं  तुम्हारा  अब  किधर हूँ  तुम  समझते  क्यूँ नही/1/

मैं  मुसाफिर हूँ   तेरे   पिछली  सफर की  राह का
अब  नयी  मैं  इक  डगर हूँ  तुम समझते क्यूँ नही/2/

दरमियाँ  रिश्तों  के  अब  दिखने  लगीं  हैं  दूरियाँ
कुछ  नही है  मैं  जिधर  हूँ  तुम  समझते क्यूँ नही/3/

कुछ  ठहर कर   देखते   तो    साथ  ही  पाते मुझे 
मैं  तुम्हारा   चश्मे तर हूँ   तुम   समझते  क्यूँ नही/4/

मखमली अहसास हो तुम खिलखिलाती सुब्ह का 
मैं  सुलगती   दोपहर हूँ     तुम  समझते  क्यूँ नही/5/

मर गया है  शौक  मरने का  किसी पर अब हुजूर
मैं  पृथक  ही  राह पर  हूँ  तुम  समझते क्यूँ नही/6/

साथ  रहता है  मेरे        किरदार  मेरा  हर समय
मैं  न  तन्हा  दर ब दर  हूँ  तुम  समझते क्यूँ नही/7/

हँस  पड़ा है  मन  स्वयं के देख कर हालात बस
कितना  मैं  बेबस  बशर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/8/

रखता हूँ  जिंदा जरूरत  ख्वाहिशों को मार कर
मैं  दुखों की  रह गुजर हूँ  तुम समझते क्यूँ नही /9/

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