2122 2122 2122 212
मैं गुजस्ता इक दहर हूँ तुम समझते क्यूँ नही
मैं तुम्हारा अब किधर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/1/
मैं मुसाफिर हूँ तेरे पिछली सफर की राह का
अब नयी मैं इक डगर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/2/
दरमियाँ रिश्तों के अब दिखने लगीं हैं दूरियाँ
कुछ नही है मैं जिधर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/3/
कुछ ठहर कर देखते तो साथ ही पाते मुझे
मैं तुम्हारा चश्मे तर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/4/
मखमली अहसास हो तुम खिलखिलाती सुब्ह का
मैं सुलगती दोपहर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/5/
मर गया है शौक मरने का किसी पर अब हुजूर
मैं पृथक ही राह पर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/6/
साथ रहता है मेरे किरदार मेरा हर समय
मैं न तन्हा दर ब दर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/7/
हँस पड़ा है मन स्वयं के देख कर हालात बस
कितना मैं बेबस बशर हूँ तुम समझते क्यूँ नही/8/
रखता हूँ जिंदा जरूरत ख्वाहिशों को मार कर
मैं दुखों की रह गुजर हूँ तुम समझते क्यूँ नही /9/
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