212 212 212 212
चल रही है अजब सी हवा आजकल
बे असर हो गई सब दुआ आजकल/1/
घर के आंगन से बूढा शजर जो गया
चूभने सी लगी है सबा आजकल/2/
हसरतें बस सुलगती रहीं उम्र भर
है जरूरी जरूरत जरा आजकल/3/
खत्म होता नही जिंदगी का सफर
आदमी बस मुसाफिर बना आजकल/4/
वक़्त के साथ भर तो गये जख्म पर
दिख रहा दाग सा क्यूँ भला आजकल/5/
रस्म सी रह गई हैं ये खुशियाँ सभी
अब न बाहम रहा राब्ता आजकल/6/
दरमियाँ घर के दीवार की जो खड़ी
अब है भाई पडोसी नया आजकल/7/
माँ ने दी सीख रोटी के बंटवारे की
बांट बेटों ने मां को लिया आजकल/8/
आईना कल दिखाया उसे वक़्त ने
वो है उलझा हुआ सा जरा आजकल/9/
आस जिनसे थी कल रहबरी की हमें
बन के बैठे हैं वो तो खुदा आजकल/10/
भूख रोटी पे चर्चे चुनावों में है
है यहाँ फिर ये मसला खड़ा आजकल/11/
है फसादों की जड़ में ये दैरो हरम
आदमीयत न मुद्दा रहा आजकल/12/
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