ठिठक गये थे हम कि माजरा क्या है
दहशत में है लोग फिर हुआ क्या है
ढूंढता फिरता है आज सारा शहर ही
जिंदगी जीने का यहां सलीका क्या है
कोई भी किसी से क्यूँ बोलता नही है
दरमियां दिलों के ये फासला क्या है
मानों तो सब यहां अपने ही लोग हैं
न मानों तो आपस में रिश्ता क्या है
देखा है बारिशों में भीगते सुरज को
नही जानते हैं हम कि तजुर्बा क्या है
सुब्ह शाम में उम्र तमाम हुई जाती है
बेखबर जिंदगी का फलसफा क्या है
शहर में जात थे जमात थे औकात थे
मगर आदमी होने का तरीका क्या है
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