Saturday, 26 March 2016

ठिठक गये थे हम कि माजरा क्या है

ठिठक गये थे हम कि माजरा क्या है
दहशत में है लोग   फिर हुआ क्या है

ढूंढता फिरता है आज सारा शहर ही
जिंदगी जीने का यहां सलीका क्या है 

कोई भी किसी से क्यूँ बोलता नही है
दरमियां दिलों के  ये फासला क्या है

मानों तो सब यहां  अपने ही लोग हैं
न मानों तो आपस में   रिश्ता क्या है

देखा है बारिशों में  भीगते सुरज को
नही जानते हैं हम कि तजुर्बा क्या है

सुब्ह शाम में उम्र तमाम हुई जाती है
बेखबर जिंदगी का फलसफा क्या है

शहर में जात थे जमात थे औकात थे
मगर आदमी होने का तरीका क्या है

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