सुखे फुल के जैसे रिश्ते खुशबू से उन्हें मिलाये कौन
कुछ अहसास सिरहाने बैठे नींद में उन्हें सुलाये कौन
तिनका पत्ता खुशबू सब ही आंधियों में उड जाते
दर्द दिलो मे पसरा हुआ है आंधी तक ले जाये कौन
दिन ढलते ही आवारा बनकर मारा मारा फिरता है
काली चादर ओढे सोया सुब्ह सुरज को जगाये कौन
दो पहर में साया अपना कद से भी ऊंचा हो गया
दो पहर बाद फिर साये को खुद ही से मिलाये कौन
हरदम ही धुंए में जलती है मां की आंखें सच नहीं
बेटे की मुश्किलों में भी बहते हैं आंसू जताये कौन
उधार की मुस्कान देखकर अपने बाप के चेहरे पर
माँ के पल्लू में छिप बेटी रोती है ढांढस बंधाये कौन
वक्त की झोली से कुछ लम्हें चुराये थे जीने के लिए
फटी जेब से कहां गिर गए उनकी खबर बताये कौन
No comments:
Post a Comment