मुसीबतों ने कभी रखा ही नहीं तन्हा हमे
जले पडोस में चुल्हा मिलता है धुंआ हमे
रोज ढुंढता हूँ घर पे उसके खोये से निशां
रोज होता है बरामद अपना ही हिस्सा हमे
हालात की मजबूरियां ये मुसलसल दूरियां
जिंदगी लगती बस जरुरतों का किस्सा हमे
अब कहां वो बरकते नसीहतें औ हिदायतें
अब तो सौदेबाजी सी लगती है दुआ हमे
कुछ अधजले खयाल चंद हसरते दबी हुई
आज अपने सिरहाने ये सामान मिला हमें
चांद की पीली आँच में तपता रहा रात भर
सुब्ह झुलसा कराहता ख्वाब इक दिखा हमें
मुर्दों के इस शहर में खुदकुशी की अर्जियां
जमीर बेच दिये है नहीं दिखे कोई जिंदा हमे
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