चिंदी चिंदी फिर दिलों के वो जज्बात करे है
बिखरी सी हसरतों के तहकीकात करे है
जमाने में यूं तो सारे ही मंजर सुहाने लगते हैं
खुशियाँ लेकिन खुद के घर मुलाकात करे है
तपते से खयालो की हरारत जरा सी रह गई
दुरुस्ती में तो अक्सर ये आंखें बरसात करे है
ख्वाहिशे सब जेब की सुराखों से फिसल गई
जरुरते मेरे तनख्वाह की ही मालूमात करे है
जो मौत से कभी डरा नहीं बच्चों से डर गया
वो रोज ही घर पर भुख से दो दो हाथ करे है
हर सफहा पलटते ही सिसकियाँ निकलती है
उधड़े उधड़े से हैं कई जो खयालात करे है
क्यूँ खींच गई यूँ रिश्तो के दरमियां ही दीवारें
कई टुकडों में बंटी मां ये सवालात करे है
मजहब दौलत जात घराना शोहरत खुद्दारी
ऐ जिंदगी हर मोड़ पर ऐसे मुश्किलात करे है
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