Sunday, 28 February 2016

जरा जरा सा करके संवरने लगी है

जरा जरा सा करके संवरने लगी है
धुप मेरे आंगन भी   उतरने लगी है

झीलों का शहर है    प्यासा है पंछी
इक बुंद में हालात निखरने लगी है

मजबूरियों से हाथ      बंधे हैं अभी
भुख बेझिझक सबसे लड़ने लगी है

सब जिंदगी ही चुल्हे पर दिखती है
न गली न पकी बस उबलने लगी है

जाने कैसा बंधन कौन-सा रिश्ता है
आंखों के रस्ते    जो रिसने लगी है

खिलौने माशूका  रुतबा फिर खुदा
उम्र से यूं फितरत झलकने लगी है

चांद की पीली आँच में झुलस कर
कुछ ख्वाबों में दरारें पडने लगी है

जरा जरा करके   मौत आ रही है
जरा जरा    उम्र भी ढलने लगी है

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