आंखों में लगा काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा
वफा की उम्मीद चादर से भला कैसे करे
फकत छेद से सब दर्द बयां जरुर होगा
अजनबी से है आज तेरे शहर में तो क्या
वहीं कहीं पे अपना भी निशां जरुर होगा
मिठास रिश्तो की सब ही क्यूँ खोने लगी
कोई तो फासला इस दरमियां जरुर होगा
तेरा जिक्र फिक्र और तेरे खयाल सवाल
इसके सिवा कुछ नहीं बचा जरुर होगा
खुन से सना हुआ अखबार दिख रहा है
नफरतों से फिर कहीं बलवा जरुर होगा
उसी अखबार मे भुखा रोटी रख खा रहा
जिसकी खबरों का यहां मुद्दा जरुर होगा
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