आंखों में लगा काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा
उम्मीदें वफा की हो चादर से भला कैसे
पैबंद से भी हाले बयां जरुर होगा
हम आज अजनबी से जो है तेरे शहर में
यहीं कहीं पे अपना निशां जरुर होगा
रिश्तों की महक कैसे यूँ खोने अब लगी है
दरमियां कोई तो बोझा जरुर होगा
जिक्र फिक्र तेरा खयालो सवाल तेरे
कुछ इसके सिवा भी तो चर्चा जरुर होगा
सिक्कों की खनक हरदम कानों में गूंजते
तब रिश्तों ने भी घर को छोडा जरुर होगा
रक्त में नहा कर अखबार आज आया है
शहर में कहीं बलवा हुआ जरुर होगा
अखबारो मे ही भुखा रोटी लपेट लाया
संसद पटल में कल ये मुद्दा जरुर होगा
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