ख्वाहिशे सांस भी नहीं ले पाती यहां
जरुरतों का इस घर में धुंआ बहुत है
नींद तो अब भी बहुत आती है मगर
जिम्मेदारियों का मुझपे बोझा बहुत है
घर की बात थी बाजार तक आ गई
तकदीर संग अपना झगड़ा बहुत है
घर का अखबार बुजुर्ग सा लगता है
जरूरत के बाद लगता बेजा बहुत है
बर्फीले अहसास कभी जी कर देखिए
गर्म जज्बातों का महज धोखा बहुत है
मुसीबतें आना जाना करती रहती है
इस घर के साथ उसका रिश्ता बहुत है
No comments:
Post a Comment