खैरातों में लिपटी हुई सी जिंदगी मिली
लोगों के रहमतो पे हमें हर खुशी मिली
चाहा मुस्कुराने तो आंसू निकल पड़े
हर मोड़ पर हालातों की बेबसी मिली
कभी दुआ तो कभी बद्दुआ से लडते
उम्र भर ही किश्तों में खुद कुशी मिली
मिट्टी के बुतों का यहां मेला लगा हुआ
हमे कही इंसान की मुरत नहीं मिली
दर्द बदन पर फैले हर कपड़े मिले मैले
राख के ढेर तो मिले चिंगारी नहीं मिली
दिन तो गुजरता जाता यूं ही बुझा बुझा
शाम तलक नसीबो से रोशनी नहीं मिली
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