तुरपाई लिबास के कहां कहां से उधड़े
कुछ यहाँ से उधड़े कुछ वहाँ से उधड़े
अश्कों के धागे से सी लेते हैं कुछ गम
पैबंद लगा देते हंसी के जहां से उधड़े
जरा सी आंच मे झुलस जाते हैं रिश्ते
बहुत ऐसे है जो हमारी जुबां से उधड़े
कद लोगों के बहुत अब ऊंचे हो गये
यार भी मुफलिसी के निशां से उधड़े
लगे है मेले खुशी के जिस्म के बाहर
सुलगते दर्द से उठते धुंआ से उधड़े
सांसो को छूके जो कोई महक निकली
पीछे पीछे जो चले आंसू वहां से उधड़े
हवाएँ जैसी हो हर बात भी उसी तरह
शहर फिर क्यूँ कभी तेरे बयां से उधड़े
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