उन घरो के किस्से अखबारो मे नही आते
भुखे पेट होकर भी जो बाजारो मे नही आते
डबडबा जाती है आंखे रास्ता ताकते तकते
दूर गये वो अपने जब त्योहारो मे नही आते
चीख निकल गई हमारी तो जुल्म हो गया
कत्ल करके भी वो गुनहगारो मे नही आते
चंद मौकापरस्ती के इर्द गिर्द घुमती रहती है
शरीफुन् नफ्स कोई सरकारो मे नही आते
मुफलिस बस्तियों पर मेहर है निजाम की
खंडहर मे रहने वाले लाचारो मे नही आते
हमारे भी शहर मे ख्वाहिशमंद बेशुमार है
सभी के हुनर लेकिन इश्तेहारो मे नही आते
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