कभी मिलता है तो सादगी की बात करता है
मेरा किरदार भी जिंदगी की बात करता है
यूँ तो लगता है जमाने से रूठा रूठा सा
फिर भी इबादत की बंदगी की बात करता है
अंधेरो मे गुजारी है जिसने तमाम हयात
उजाले चाहता है वो रोशनी की बात करता है
चाक जिगर है वो फटेहाल है बदहवास है
पर चेहरा हंसमुख है दिल्लगी की बात करता है
उम्र दराज़ी मे भी क्या आशिकी सुझती है
जिंदगी की सांझ मे मौशूकी की बात करता है
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