Wednesday, 7 October 2015

सुबह सवेरे

मुह चिढाती झांकती
चौखट की दरारो से
धुप सुबह की

सुरज की
किरणे भी
छप्पर के
सुरागो से
झोपडी मे घुसने को
आतुर है

जैसे किसी नये दिन का
संदेश ले के आया है
कोई

नई सुबह फिर वही
ख्वाहिशें
फिर वही
जरूरते

फिर से आज
कुछ ख्वाब
दफ्न करने होंगे
सीने मे

जरूरतो की कीमत पर
कुछ मुस्कान
फिर से गायब
हो जायेगी आज

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