लम्हो की शरारत बाकी है
वक्त की नजाकत बाकी है
जुबां से बयां नही होती
दिल मे मोहब्बत बाकी है
कुछ लिहाज है जमाने का
आंखो मे लरजत बाकी है
पोशीदगी भी जरूरी है
इतनी तो शराफ़त बाकी है
पहचानते है हमे भी कुछ
शहर मे इज्जत बाकी है
यार फिरते है नमक लिए
उनके भी तोहमत बाकी है
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