Wednesday, 21 October 2015

थक गये जिंदगी की शरारत लिखते लिखते

थक गए जिंदगी की शरारत लिखते लिखते
उमर बीत गई अपनी वसीयत  लिखते लिखते

बच्चे बड़े होने लगे अब घर छोटा लगने लगा
कागज कम पडने लगे जरूरत लिखते लिखते

बस खत मे ही पुछ लेते है वो हाल कैसा है
आंसू छलक आते है गुरबत लिखते लिखते

मां की ममता अमरबेल सी बढती ही जाती है
औलादे भूल जाती है अदायत लिखते लिखते

दास्ताने रसुख बंद कर दैरो हरम की अब तो
कई हाथ कजा हो गए इबारत लिखते लिखते

अरसा गुजर गया उस गली से हमको गुजरे
फिर याद आ गये वो मोहब्बत लिखते लिखते

जमाने भर की उंगलिया उठती रही है हम पर
परेशां हो गये हम वाजबियत  लिखते लिखते

आज भी चमक जाती है निगाहे उन्हे  सोच कर
अब भी मचल जाती है तबीयत लिखते लिखते

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