थक गए जिंदगी की शरारत लिखते लिखते
उमर बीत गई अपनी वसीयत लिखते लिखते
बच्चे बड़े होने लगे अब घर छोटा लगने लगा
कागज कम पडने लगे जरूरत लिखते लिखते
बस खत मे ही पुछ लेते है वो हाल कैसा है
आंसू छलक आते है गुरबत लिखते लिखते
मां की ममता अमरबेल सी बढती ही जाती है
औलादे भूल जाती है अदायत लिखते लिखते
दास्ताने रसुख बंद कर दैरो हरम की अब तो
कई हाथ कजा हो गए इबारत लिखते लिखते
अरसा गुजर गया उस गली से हमको गुजरे
फिर याद आ गये वो मोहब्बत लिखते लिखते
जमाने भर की उंगलिया उठती रही है हम पर
परेशां हो गये हम वाजबियत लिखते लिखते
आज भी चमक जाती है निगाहे उन्हे सोच कर
अब भी मचल जाती है तबीयत लिखते लिखते
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