221 1222 221 1222
सिमटी हुई सहमी सी सकुचाई हुई गजलें
अहसास में भीगी सी लरजाई हुई गजलें
अब आज नही मिलती लरजाई हुई गजलें
अब आने लगी है बस मुरझाई हुई गजलें
सौ तर्ह की ही उलझन जब जह्न में चलती हो
फिर कैसे कलम लिक्खे शरमाई हुई गजलें
ढूंढे है जहां मेरी गजलों में तुझे हरदम
गजलें न हुई जैसे परछाई हुई गजलें
दुत्कार लताड़ों पर भी साथ नही छोड़े
इस तर्ह मेरी जानां शैदाई हुई गजलें
है शोर शराबा बस कुछ और भला है क्या
इस दौर में फूहड़ पन से गायी हुई गजलें
देखा है बहुत मंचों पर नाम दराजों को
पढ़ते हुए चुपके से सरकाई हुई गजलें
हर लफ्ज़ को शिद्दत से अहसास ओढ़ाया है
देखा ही किसी ने कब ठुकराई हुई गजलें
कथनी और करनी में जब फर्क मिला बेहद
आयीं हैं कुछ ऐसी भी भरमाई हुई गजलें
शिद्दत से निचोड़ा है दिल अपना सुखनवर ने
पर रास न आयी फिर बिसराई हुई गजलें
सब कुछ बदल करके रख देंगीं घड़ी भर में
इस तौर से आयीं है गुस्साई हुई गजलें
अब दिल की नही कहती अब दिल से नही कहती
दरबारी हुई गजलें पजीराई हुई गजलें
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