1222 1222 1222 1222
कभी हमको यूँ जीने का तरीका क्यूँ नहीं मिलता
फकत गिरके फिर उठने का ये मौका क्यूँ नहीं मिलता
तसल्ली चैन राहत औ र सुकूं भी तो कभी मिलते
कभी कुछ दर्द अश्कों के अलावा क्यूँ नहीं मिलता
मिला जो भी वो था लबरेज़ ही बस रंजो गम से यूँ
कहीं कोई बसर भी मुस्कुराता क्यूँ नहीं मिलता
उसूलों पर गुजर होती रही है जिंदगी अपनी
कहीं कोई जमीरों का भी जागा क्यूँ नहीं मिलता
यूँ ही बे लुत्फ़ बे मतलब नकारा बे मुरव्वत सा
मुझे कुछ भी मुकम्मल सा इरादा क्यूँ नहीं मिलता
गिरह खुलती रही हर सांस पर हर दिन हर इक लम्हा
मेरे भीतर कोई ऐसा तमाशा क्यूँ नहीं मिलता
मुकद्दर चांद का बिल्कुल हमारे जैसा लगता है
वो तन्हा रहता है लेकिन वो तन्हा क्यूँ नही मिलता
सुलगते रहते हैं अरमां महक आती ही रहती है
भला कब खाक होंगे कुछ पता सा क्यूँ नहीं मिलता
No comments:
Post a Comment