कहाँ तक सिये अब रफूगर बिचारे
फटे हाल जर जर है मंजर बिचारे
कहीं दब गयी कहकहों में उदासी
न रो भी सके खुल के जोकर बिचारे
हुए मस्त मौला हर इक आदमी अब
दिखाएं क्या रस्ता ये रहबर बिचारे
मिटी हाथ धो धो के हाथो की रेखा
भला क्या करेंगे मुकद्दर बिचारे
बनावट की कीमत बढ़ी आजकल है
पड़े मेहराबों पे गौहर बिचारे
नजारत को मिलते नही आदमी अब
तरसने लगे अब हैं मंजर बिचारे
हर इक शख़्स ही दर्द में है सरापा
कहाँ तक उकेरे मुसव्वर बिचारे
कड़ी धूप है सर पे सूरज है गम का
किधर जाए साए को लेकर बिचारे
गया भूल क्या रब बनाकर मुझे या
कहीं और हैं मुझसे बढ़कर बिचारे
यहां शर्त जीने की टेढ़े बनो जी
जो सीधे रहे हैं गये मर बिचारे
कोई तो बताओ कुछ हल मसलओ के
दुआओं में है यूँ तो कई सर बिचारे
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