Tuesday, 15 September 2020

ठहर गये थे जरा हम कि माजरा क्या है

1212 1122 1212 22 
ठहर  गये  थे   जरा  हम   कि  माजरा  क्या है 
क्यूँ   सहमे सहमे  से हैं लोग फिर हुआ क्या है

क्यूँ   ढूंढता   है  फिरे   आज  शहर  सारा  ही 
ऐ  जिंदगी  तुझे  जीने  का  तौर नया   क्या है

किसी  से   कोई  यहाँ   बोलता  नही  है  कुछ 
दिलों  के  दरमियाँ  देखो  ये  फासला  क्या है

यूँ   मानिए   तो   यहां   सारे   लोग   अपने हैं 
न  मानिएगा  तो    आपस  में  राब्ता   क्या है

यूँ  हमने  देखा  है  बारिश  में  भीगता  सुरज 
मगर  न  जानते  हैं  हम  कि  तर्जबा  क्या है

कि  सुब्ह  शाम  में   ही   जिंदगी  तमाम हुई 
हैं बेखबर कि ये जीवन का फलसफा क्या है

जमात   जात   मिले   शहर   में   मेरे  मौला
बताओ   आदमी   होने  का   रास्ता  क्या है

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