1212 1122 1212 22
ठहर गये थे जरा हम कि माजरा क्या है
क्यूँ सहमे सहमे से हैं लोग फिर हुआ क्या है
क्यूँ ढूंढता है फिरे आज शहर सारा ही
ऐ जिंदगी तुझे जीने का तौर नया क्या है
किसी से कोई यहाँ बोलता नही है कुछ
दिलों के दरमियाँ देखो ये फासला क्या है
यूँ मानिए तो यहां सारे लोग अपने हैं
न मानिएगा तो आपस में राब्ता क्या है
यूँ हमने देखा है बारिश में भीगता सुरज
मगर न जानते हैं हम कि तर्जबा क्या है
कि सुब्ह शाम में ही जिंदगी तमाम हुई
हैं बेखबर कि ये जीवन का फलसफा क्या है
जमात जात मिले शहर में मेरे मौला
बताओ आदमी होने का रास्ता क्या है
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