हुए हैं बहुत फिर से दर दर बिचारे
करें अब तो अफसोस पत्थर बिचारे
निकल तो पड़े हैं मुसाफत में लेकिन
कदम दर कदम खाते ठोकर बिचारे
ये मुश्किल भरा दौर आया है ऐसा
रहे कोस अपना मुकद्दर बिचारे
कहां तो गये थे कमाने को रोटी
मगर लौटे हैं भूख लेकर बिचारे
थे आंखों में सपने सुहाने से कल के
कहाँ जाए अब उनसे डर कर बिचारे
जमीं बेच पुरखों की थे शहर आए
गवां आज सब कुछ है दर दर बिचारे
चले तो हैं आए मगर दूर है घर
वहीं पर थे इससे तो बेहतर बिचारे
फकत खाक होने की खातिर उमर भर
चले जा रहे सब यहां पर बिचारे
भला कौन लड़ पाए अपने मुकद्दर
गये आए कितने सिकंदर बिचारे
उठाते नही जो कदम देख कर के
यकीनन वो खाते हैं ठोकर बिचारे
न जाने हो क्या फैसला जीस्त का कल
बिताते हर इक लम्हा हंस कर बिचारे
रहम कर ऐ मौला गरीबी पे कुछ तो
सरापा है आंसू से सर सर बिचारे
फटी एक ही रह गयी पास इनके
क्या ओढ़े बिछाए क्या चादर बिचारे
खुदा मेरे हिस्से की कम कर दे रोटी
मगर कोई सोये न रोकर बिचारे
तमाम उम्र के है असासा ये अशआर
उलझते है आपस में अक्सर बिचारे
कहीं गर बिके तो बताना गजल ये
कि बच्चे हैं भूखे मेरे घर बिचारे
No comments:
Post a Comment