Tuesday, 15 September 2020

हुए हैं बहुत फिर से दर दर बिचारे

हुए  हैं   बहुत  फिर  से   दर दर  बिचारे
करें  अब  तो  अफसोस  पत्थर  बिचारे

निकल  तो  पड़े  हैं  मुसाफत में लेकिन
कदम  दर  कदम  खाते  ठोकर  बिचारे

ये  मुश्किल  भरा  दौर  आया  है   ऐसा
रहे    कोस    अपना    मुकद्दर   बिचारे

कहां   तो   गये  थे   कमाने   को   रोटी
मगर   लौटे   हैं   भूख    लेकर   बिचारे

थे  आंखों में  सपने  सुहाने  से  कल के
कहाँ  जाए  अब  उनसे  डर कर बिचारे

जमीं  बेच  पुरखों  की   थे  शहर  आए
गवां  आज  सब कुछ  है दर दर बिचारे

चले  तो   हैं  आए   मगर   दूर  है   घर
वहीं  पर  थे  इससे  तो  बेहतर  बिचारे

फकत खाक होने की खातिर उमर भर
चले  जा  रहे   सब   यहां  पर   बिचारे

भला  कौन  लड़  पाए  अपने  मुकद्दर
गये    आए    कितने  सिकंदर  बिचारे

उठाते  नही   जो  कदम   देख  कर के
यकीनन  वो  खाते  हैं   ठोकर   बिचारे

न जाने हो क्या फैसला जीस्त का कल
बिताते  हर  इक  लम्हा हंस कर बिचारे

रहम  कर  ऐ मौला  गरीबी  पे  कुछ तो
सरापा  है   आंसू  से   सर सर   बिचारे

फटी  एक  ही   रह  गयी   पास   इनके
क्या  ओढ़े  बिछाए  क्या  चादर बिचारे

खुदा  मेरे  हिस्से  की  कम  कर दे रोटी
मगर   कोई   सोये   न   रोकर   बिचारे

तमाम उम्र  के है  असासा  ये अशआर
उलझते  है  आपस  में  अक्सर  बिचारे

कहीं  गर   बिके  तो  बताना   गजल ये
कि   बच्चे   हैं   भूखे    मेरे  घर  बिचारे

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